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*युवा शक्ति का आह्वान: तमाशबीन नहीं, समाज परिवर्तन के सूत्रधार बनें* इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि जब-जब समाज में वैचारिक जड़ता आई है, जब-जब रूढ़िवादिता ने प्रगति के मार्ग को अवरुद्ध किया है, तब-तब युवाओं की ऊर्जा ने ही क्रांति का शंखनाद किया है। आज का युवा तकनीक, सूचना और असीम स्वप्नों से लैस है। उसके पास दुनिया को बदलने के लिए 'डिजिटल हथियार' हैं, लेकिन विडंबना यह है कि वह अपनी इस प्रचंड शक्ति को केवल व्यक्तिगत उन्नति, सोशल मीडिया के लाइक्स, रील और दिखावे की दुनिया में खपा रहा है। युवा वह शक्ति है जिसके पास ऊर्जा है, सपने हैं और सबसे बड़ा-समय है। लेकिन क्या यह समय केवल उपभोग के लिए है? *महात्मा ज्योतिबा राव फुले ने आज से डेढ़ सदी पहले चेतावनी देते हुए कहा था* "विद्या बिना मति गयी, मति बिना नीति गयी, नीति बिना गति गयी, गति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र टूटे, *इतने अनर्थ एक अविद्या ने किए।* *फुले जी* का यह संदेश आज के सन्दर्भ में और भी गहरा हो जाता है। आज हमारे युवाओं के पास डिग्रियाँ तो हैं, लेकिन क्या वह 'विद्या' है जो समाज की नीति और गति बदल सके? यदि हमारी शिक्षा हमें केवल एक वेतनभोगी कर्मचारी बनाती है और समाज में व्याप्त गैर-बराबरी को देखने की दृष्टि नहीं देती, तो वह शिक्षा अधूरी है। *मौन की साझेदारी: एक नैतिक संकट* समाज में बुराई इसलिए नहीं फलती-फूलती कि बुरे लोग सक्रिय हैं, बल्कि इसलिए फलती है क्योंकि समाज का सबसे ऊर्जावान हिस्सा यानी *'युवा' और 'शिक्षित वर्ग' मौन है।* *बाबा साहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने आजीवन संघर्ष के बाद हमें एक मंत्र दिया था* "शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।" यहाँ शिक्षित होने का अर्थ केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त करना नहीं है, बल्कि अपने अधिकारों, अपने इतिहास और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होना है। अक्सर देखा गया है कि युवा वर्ग अपनी ऊर्जा को पार्टी, जॉब और फॉलोअर्स बढ़ाने में लगा देता है, जबकि असली ताकत तब बनती है जब यह ऊर्जा समाज की दिशा बदलने में लगे। *समाज कभी अपने आप आगे नहीं बढ़ता* उसे आगे बढ़ाने के लिए कुछ लोग लड़ते हैं, कुछ लिखते हैं, कुछ बोलते हैं और कुछ साथ खड़े रहते हैं। *लेकिन सबसे खतरनाक वह वर्ग है, जो न लड़ता है, न लिखता है, न बोलता है—वह बस किनारे बैठकर 'तमाशा' देखता है।* ऐसे लोग इतिहास में कभी बदलाव के सूत्रधार नहीं बने, वे सिर्फ दूसरों के संघर्ष पर राय देने वाले 'दर्शक' बनकर रह गए। *परिवर्तन के चार अनिवार्य मार्ग* समाज को उन्नति की ओर ले जाने के लिए युवाओं को चार स्तरों पर अपनी भूमिका तय करनी होगी: *लड़ना* इसका अर्थ केवल शारीरिक युद्ध नहीं, बल्कि अन्याय, कुरीतियों और भेदभाव के विरुद्ध धरातल पर वैचारिक और संवैधानिक संघर्ष है। *लिखना* लेखनी में वह ताकत है जो सोए हुए समाज को जगा सकती है। यदि आप लड़ नहीं सकते, तो अपनी कलम उठाइए और समाज की सच्चाई को दुनिया के सामने लाइए। *बोलना* तर्क और तथ्यों के साथ अपनी बात निडर होकर रखना। चुप्पी तोड़ना ही बदलाव की पहली शर्त है। *साथ देना* जो लोग निस्वार्थ भाव से समाज की उन्नति के लिए लड़ रहे हैं, उनका मनोबल बढ़ाना और उनके पीछे चट्टान की तरह खड़े होना। यदि आप इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते, तो कम से कम उन लोगों का *उपहास मत उड़ाइए जो आपके हिस्से की लड़ाई लड़ रहे हैं।* समाज की सबसे बड़ी त्रासदी विरोध नहीं, बल्कि अपने ही लोगों द्वारा किया गया तिरस्कार और चरित्रहनन है। *सवालों की महत्ता: प्रगति की पहली सीढ़ी* जब कोई युवा समाज सुधार की बात करता है या स्थापित व्यवस्था पर सवाल उठाता है, तो उसे अक्सर 'विद्रोही' या 'समाज विरोधी' कहकर चुप कराने की कोशिश की जाती है। *हमें यह समझना होगा कि सवाल समाज को कमजोर नहीं करते, बल्कि उसे मानसिक गुलामी की बेड़ियों से आजाद करते हैं।* जो समाज सवालों से डरता है, वह कभी प्रगति नहीं कर सकता; वह सिर्फ परंपराओं के बोझ तले दबा रह जाता है। *बाबा साहेब ने स्पष्ट कहा था* "छीने हुए अधिकार भीख में नहीं मिलते, अधिकार वसूल करने पड़ते हैं।" और यह वसूली तभी संभव है जब युवा वर्ग 'तमाशबीन' बनना छोड़कर वैचारिक रूप से समृद्ध और मुखर हो। समाज के प्रति आपकी वफादारी किसी व्यक्ति विशेष या अंध-परंपरा से नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और मानवीय समानता से होनी चाहिए। *आज के युवा का संकल्प और भविष्य की राह* आज का युवा केवल एक 'उपभोक्ता' नहीं है, वह भविष्य का 'निर्माता' है। वह सिर्फ सपने देखने वाला नहीं, बल्कि उन सपनों को धरातल पर उतारने वाला बदलाव का अग्रदूत है। आज समाज को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो यह समझें कि समाज सुधार किसी एक नेता, लेखक या संगठन की जागीर नहीं है, बल्कि यह हमारा सामूहिक नैतिक कर्तव्य है। *मेरे युवा साथियों,* आज आपसे मेरा आह्वान है कि एक छोटा सा संकल्प लें: *"मैं समाज की उन्नति की इस लड़ाई में अपने स्तर पर योगदान दूंगा। मैं अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज उठाऊंगा और जहाँ संभव होगा, सही के पक्ष में खड़ा होऊंगा।"* इतिहास तालियाँ बजाने वालों को नहीं, बल्कि सच बोलने वालों और संघर्ष करने वालों को याद रखता है। *आपका एक छोटा सा कदम, एक छोटा सा लेख या एक छोटा सा विरोध पूरे कारवां की दिशा बदल सकता है।* उठो, चेतो और समाज की उन्नति के सारथी बनो। *याद रखिए, यदि आप हर गलत बात पर चुप रहते हैं, तो आप भी उस गलत के उतने ही साझेदार बन जाते हैं।* अपनी ऊर्जा को सही दिशा दें और एक ऐसे भारत के निर्माण में भागीदार बनें जिसका सपना महात्मा फुले और बाबा साहेब अंबेडकर ने देखा था। *जय भारत, जय भीम, नमो बुद्धाय* विनीत: सोहनलाल सिंगारिया प्राचार्य (RES) एवम सामाजिक कार्यकर्ता प्रदेश उप सभा अध्यक्ष, राजस्थान शिक्षक संघ (अंबेडकर) संपर्क: 94622-60179 Email sohanlalsingaria@gmail.com