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*माता रमाबाई: त्याग, तपस्या और मौन बलिदान की प्रतिमूर्ति*जब भी इतिहास डॉ. भीमराव अंबेडकर को 'संविधान निर्माता' और 'शोषितों के मसीहा' के रूप में याद करता है, तब एक मौन लेकिन अत्यंत तेजस्वी अध्याय स्वतः ही उभर कर सामने आता है। वह अध्याय है—*त्याग की प्रतिमूर्ति माता रमाबाई अंबेडकर का जीवन।* माता रमाबाई केवल बाबा साहब की अर्धांगिनी नहीं थीं, बल्कि वे उस महान सामाजिक क्रांति की आधारशिला और प्राणशक्ति थीं।*संघर्ष की मूक आधारशिला*माता रमाबाई का जीवन शब्दों या भाषणों का मोहताज नहीं, बल्कि निरंतर सहे गए कष्टों और अटूट धैर्य की एक जीवंत गाथा है। जिस समय डॉ. अंबेडकर वैश्विक स्तर पर शिक्षा, लेखन और सामाजिक चेतना की मशाल जला रहे थे, उस समय माता रमाबाई घर की जर्जर दीवारों के बीच अभावों से लड़ रही थीं।उनका त्याग कोई साधारण त्याग नहीं था। उन्होंने अपने सुख, स्वास्थ्य और यहाँ तक कि अपनी बुनियादी जरूरतों को भी तिलांजलि दे दी ताकि बाबा साहब का मार्ग निष्कंटक बना रहे। कई बार तो घर में अन्न का दाना तक नहीं होता था, लेकिन उनके स्वाभिमान और समर्पण ने कभी बाबा साहब को इस संघर्ष से पीछे हटने नहीं दिया। वे जानती थीं कि यदि भीमराव रुक गए, तो करोड़ों शोषितों की मुक्ति का स्वप्न हमेशा के लिए अधूरा रह जाएगा।*संतानों का बलिदान: एक हृदयविदारक सत्य*यह विषय केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि उस समय की सामाजिक और आर्थिक विषमता का क्रूर आईना है। माता रमाबाई और बाबा साहब की संतानों ने असमय ही इस दुनिया को विदा कह दिया। वे बच्चे केवल एक परिवार के सदस्य नहीं थे, बल्कि वे उस व्यवस्था की भेंट चढ़ गए जिसके खिलाफ बाबा साहब लड़ रहे थे।गरीबी और उचित चिकित्सा के अभाव में एक माँ अपनी आँखों के सामने अपने जिगर के टुकड़ों को एक एक कर खोती रही, लेकिन उन्होंने अपने दुख को कभी बाबा साहब के मिशन की बाधा नहीं बनने दिया। *यह असाधारण मातृत्व था।* उन्होंने अपने बच्चों को खोया, लेकिन कभी आंदोलन को दोष नहीं दिया, न ही कभी बाबा साहब के संकल्प को कमजोर पड़ने दिया। *उनके बच्चे संघर्ष की उस राह के 'अनदेखे शहीद' थे, जिसकी कीमत समाज के उत्थान के लिए चुकाई गई।**संविधान निर्माण के पीछे की शक्ति*अक्सर कहा जाता है कि डॉ. अंबेडकर ने भारत को संविधान दिया, लेकिन यह भी सत्य है कि उस 'अंबेडकर' को गढ़ने में माता रमाबाई का अतुलनीय योगदान था। यदि माता रमाबाई घर की जिम्मेदारियों का बोझ अपने कंधों पर न उठातीं, यदि वे अभावों को मुस्कुराहट के साथ न सहतीं, तो शायद विश्व को इतना महान विधिवेत्ता और विचारक नहीं मिल पाता।*संविधान* केवल शब्दों और धाराओं से नहीं बना है। यह बना है एक स्त्री के असीम धैर्य से, एक माँ के आंसुओं से और उन बच्चों की मासूम आहों से जिन्होंने संघर्ष की वेदी पर दम तोड़ दिया। *इसलिए, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर वास्तव में माता रमाबाई के ऐतिहासिक त्याग और तपस्या की ही देन हैं।**निष्कर्ष*आज जब हम स्वतंत्र भारत और उसके संवैधानिक अधिकारों की बात करते हैं, तो हमें उन मौन बलिदानों को भी नमन करना चाहिए जो इतिहास के पन्नों में कहीं ओझल रह गए। माता रमाबाई और उनके बच्चों का बलिदान बाबा साहब के आंदोलन की वह ऊर्जा है जिसने करोड़ों दीप प्रज्वलित किए।*नमन है, उस महा माता को, जिसने खुद को मिटाकर समाज को एक नया जीवन दिया।*लेखक:सोहनलाल सिंगारियाप्राचार्य (RES) सामाजिक कार्यकर्ता ब्यावरप्रदेश उप सभा अध्यक्ष राजस्थान शिक्षक संघ अम्बेडकर
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