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*सामाजिक क्रांति के महानायक: चेतना, संघर्ष और समता का गौरवशाली सफर*आज का आधुनिक भारत जिस संवैधानिक लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की नींव पर खड़ा है, वह किसी एक दिन के प्रयास का परिणाम नहीं है। यह उन महान नायकों की सदियों लंबी तपस्या, संघर्ष और शहादत का फल है, जिन्होंने जाति और वर्ण के दमनकारी चक्र को तोड़कर 'बहुजन समाज' के लिए सम्मान और अधिकारों के द्वार खोले। अक्सर हम अपनी सफलता को केवल व्यक्तिगत 'मेहनत' का नाम देते हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी मेहनत को 'अधिकार' में बदलने के लिए हमारे बहुजन समाज के महापुरुषों ने अपने जीवन की आहुति दी है।*वैचारिक क्रांति का उद्गम*इस क्रांति की शुरुआत *तथागत बुद्ध* के उस धम्म से होती है, जिसने 'बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय' का मार्ग प्रशस्त किया और *जन्म आधारित श्रेष्ठता* को नकार कर प्रज्ञा और करुणा को स्थापित किया। इसी मार्ग को *सम्राट अशोक महान* ने राजधर्म बनाया और भारत को विश्व गुरु की पहचान दिलाई। मध्यकाल में *संत कबीर और संत शिरोमणि सतगुरु रैदास* ने अपनी निर्भीक वाणी से पाखंड और छुआछूत की जड़ों पर प्रहार किया।*संत शिरोमणि सतगुरु रैदास* का 'बेगमपुरा' आज भी एक ऐसे आदर्श समाज का प्रतीक है जहाँ दुख और भेदभाव का कोई स्थान न हो।*शिक्षा और अधिकार का उदय*आधुनिक युग में सामाजिक क्रांति की मशाल *महात्मा जोतिराव फुले* ने जलाई। उन्होंने पहचाना कि 'विद्या बिना मति गई' और पिछड़ों व वंचितों के लिए शिक्षा के द्वार खोले। उनकी इस क्रांति में *शिक्षा की देवी सावित्रीबाई फुले* ने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया और समाज का कीचड़-पत्थर सहकर भी बहुजन बेटियों को शिक्षित किया। वहीं, कोल्हापुर के राजा *छत्रपति शाहूजी महाराज* ने 1902 में पहली बार पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर सत्ता में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की। छत्रपति साहू जी महाराज ने,ही बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें विश्व स्तर का विद्वान बनाने में सहयोग किया।त्याग और संघर्ष की अटूट कड़ी*माता रमाबाई अम्बेडकर* का त्याग अतुलनीय है; उनके धैर्य और बलिदान ने ही बाबा साहेब को वह शक्ति दी जिससे वे करोड़ों वंचितों की मुक्ति का मार्ग लिख सके। दक्षिण भारत में *पेरियार ई.वी. रामास्वामी* ने आत्म-सम्मान आंदोलन के जरिए मानसिक गुलामी को चुनौती दी, तो केरल में *नारायण गुरु* ने 'एक जाति, एक धर्म' का मंत्र देकर मानवता को जोड़ा। *संत गाडगे महाराज* ने हाथों में झाड़ू थामकर स्वच्छता और शिक्षा का अलख जगाया, तथा दीन-दुखियों की सेवा को ही वास्तविक ईश्वर भक्ति बताया।*अस्मिता और राजनैतिक चेतना*स्वतंत्रता के संघर्ष में *बिरसा मुंडा (धरती आबा)* ने जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए 'उलगुलान' किया, तो क्रांतिकारी *मातादीन भंगी* ने 1857 के गदर की वैचारिक नींव रखी। इन सभी संघर्षों को एक तार्किक और संवैधानिक परिणति तक पहुँचाने का कार्य *बोधिसत्व,भारत रत्न डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर* ने किया,उन्होंने संविधान के माध्यम से वह 'चाबी' हमें सौंपी, जिससे तरक्की के हर बंद दरवाजे खुल गए। अंततः, *साहेब कांशीराम* ने इस बिखरे हुए समाज को राजनैतिक रूप से एकजुट कर *'याचक' से 'शासक* बनने का मंत्र दिया।*हमारा दायित्व: समाज की ओर वापसी*आज जब हम आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर या ऊंचे ओहदों पर बैठते हैं, तो याद रखना चाहिए कि उस कुर्सी के आधार में इन महापुरुषों का रक्त और पसीना लगा है। *काबिलियत* तो हमारे उन पूर्वजों में भी थी, जिन्हें स्कूल की दहलीज तक नहीं पहुँचने दिया गया। आज हमें जो मिला है, वह उन महापुरुषों की शहादत का एवम त्याग का सुफल है। समाज के प्रबुद्ध वर्ग से आह्वान है कि हम अपनी जड़ों को न भूलें। हम जहां भी हैं, *'Pay Back to Society' (समाज को लौटाने)* के सिद्धांत पर अमल करें। हमारी सफलता तभी सार्थक है ,जब हम अपने पीछे छूट गए हमारे भाइयों और बहनों का हाथ थामकर उन्हें भी मुख्यधारा में लाएं।सोहनलाल सिंगारिया प्राचार्य (RES)सामाजिक कार्यकर्ता ब्यावर प्रदेश उप सभा अध्यक्ष राजस्थान शिक्षक संघ अम्बेडकर
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