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*संविधान बनाम स्वयंभू न्याय: कब तक तुगलकी फरमानों की बलि चढ़ती रहेगी इंसानियत?*दौसा के बैजूपाड़ा क्षेत्र से आई खबर न केवल विचलित करने वाली है, बल्कि सभ्य समाज के माथे पर एक गहरा कलंक है। जब देश का कानून और पुलिस जांच किसी व्यक्ति को निर्दोष पाती है, तब समाज के कुछ स्वयंभू 'पंच-पटेलों' द्वारा उसे और उसके परिवार को बहिष्कृत कर देना सीधे तौर पर भारतीय संविधान को चुनौती देना है। इसी मानसिक प्रताड़ना ने अंततः सतीशचंद मीणा को आत्महत्या की दहलीज पर धकेल दिया।*कानून की नजर में यह अपराध क्यों है?*हमें यह समझना होगा कि किसी का सामाजिक बहिष्कार करना कोई 'परंपरा' नहीं, बल्कि एक गंभीर अपराध है। भारतीय कानून के तहत इस पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है:*अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार)* भारत का संविधान हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है। 'हुक्का-पानी' बंद करना इस मौलिक अधिकार का सीधा हनन है।*IPC की धारा 306 एवम वर्तमान में लागू भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना*)यदि किसी के बहिष्कार या प्रताड़ना से तंग आकर कोई व्यक्ति जान देता है, तो बहिष्कार करने वाले सीधे तौर पर आत्महत्या के लिए उकसाने के दोषी हैं, जिसमें 10 साल तक की सजा एवम जुर्माना हो सकता है प्रकृति: यह एक गैर-जमानती (Non-bailable) और संज्ञेय (Cognizable) अपराध है।*मानवाधिकारों का उल्लंघन* सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों *जैसे खाप पंचायतों के विरुद्ध फैसले* में स्पष्ट कहा है कि किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करना अवैध है।*राजस्थान सामाजिक बहिष्कार निवारण (प्रस्तावित ढांचा)* कई राज्यों में इसके खिलाफ सख्त कानून हैं। राजस्थान में भी ऐसे मामलों में 'भीड़तंत्र' के खिलाफ *पुलिस को तुरंत और सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।**समाज की विफलता या व्यवस्था का खौफ?*यह घटना दर्शाती है कि ग्रामीण अंचलों में आज भी जातीय पंचायतों का दबदबा कानून के खौफ से ज्यादा है। जब कोई व्यक्ति कानूनी रूप से निर्दोष साबित हो जाता है, तब भी उसे प्रताड़ित करना 'भीड़ तंत्र' की *कुत्सित मानसिकता* को दर्शाता है। यह केवल एक परिवार की क्षति नहीं है, बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे की विफलता है।*शिक्षित समाज का यह दायित्व* है, कि वह ऐसी कुरीतियों के खिलाफ खड़ा हो। यदि आज हम चुप रहे, तो कल कोई और परिवार इन 'स्वयंभू ठेकेदारों' की भेंट चढ़ जाएगा।*पुलिस और प्रशासन* को इस मामले के दोषियों (पंचों) पर ऐसी मिसाल पेश करने वाली कार्यवाही करनी चाहिए कि, भविष्य में कोई भी *न्याय' के नाम *पर 'अन्याय' का यह खूनी खेल खेलने की जुर्रत न कर सके।**सभ्य समाज में* बहिष्कार की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, केवल न्याय की जगह होनी चाहिए।*लेखक*सोहनलाल सिंगारिया प्रधानाचार्य (RES) एवंसामाजिक कार्यकर्ता ब्यावर प्रदेश उपसभा अध्यक्ष राजस्थान शिक्षक संघ अम्बेडकर
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