*अंधविश्वास: विवेक की कसौटी पर एक मानसिक रोग और उसका समाधान*आज का युग विज्ञान और तकनीक का स्वर्ण काल माना जाता है, जहाँ मानव मंगल ग्रह पर बस्तियां बसाने की योजना बना रहा है। किंतु विडंबना यह है कि आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग 'पोंगा पंथ' और 'अंधविश्वास' की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। अनपढ़ तो दूर, उच्च शिक्षा प्राप्त लोग भी अक्सर इन भ्रामक जालों में फंसे नजर आते हैं। वास्तव में, तर्क जहाँ रुक जाता है, अंधविश्वास वहीं से शुरू होता है।*अंधविश्वास का आधार: भय और अज्ञानता*अंधविश्वास कोई दैवीय शक्ति नहीं, बल्कि एक मानसिक रोग की तरह है जिसका समय पर इलाज आवश्यक है। इसके पनपने के मुख्य कारणों में शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और वैज्ञानिक चेतना की अनुपस्थिति प्रमुख है। जब व्यक्ति के मन में "कुछ गलत हो जाने का डर" घर कर लेता है, तब वह पाखंडियों का आसान शिकार बन जाता है। हमें यह समझना होगा कि हाथ की लकीरों से नहीं, बल्कि मेहनत और विज्ञान से ही तकदीर बदलती है।*संवैधानिक और नैतिक उत्तरदायित्व*भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51ए (एच) प्रत्येक नागरिक को यह कर्तव्य सौंपता है कि वह "वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और सुधार की भावना" का विकास करे। शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने भी स्पष्ट किया था कि धार्मिक अंधविश्वास और कट्टरपन हमारी प्रगति के सबसे बड़े रोड़े हैं। जो विचार आजाद ख्यालों और तर्क को बर्दाश्त नहीं कर सकते, उन्हें समाज के हित में समाप्त हो जाना चाहिए। पाखंडी बाबाओं से नाता तोड़ना और तर्क-विवेक से नाता जोड़ना ही असली राष्ट्रभक्ति है।*चमत्कार या चालाकी*अक्सर 'बाबागिरी', 'ज्योतिष' और 'भूत-प्रेत' के नाम पर समाज का आर्थिक और मानसिक शोषण किया जाता है। जिसे हम 'चमत्कार' समझकर नतमस्तक हो जाते हैं, वह अक्सर आँखों का धोखा या छद्म विज्ञान (Pseudo-science) होता है। *डॉ. अब्राहम टी. कोवूर* के शब्दों में, "जो व्यक्ति बिना जांच-पड़ताल किए चमत्कार में विश्वास कर लेता है, वह स्वयं को मूर्खता की श्रेणी में खड़ा करता है।" हमें यह याद रखना चाहिए कि जादू-टोना और चमत्कार सब बेकार हैं, वैज्ञानिक सोच ही जीवन का असली आधार है।वर्तमान में जोर-शोर से प्रचलित एक पंक्ति कटु सत्य को उजागर करती है,*इंसान बिना मुहूर्त के पैदा होता है, लेकिन पूरी जिंदगी 'शुभ मुहूर्त' के फेर में फंसा रहकर अंततः एक दिन बिना मुहूर्त के ही संसार से विदा हो जाता है।"**निष्कर्ष*अंधविश्वास मुक्त समाज ही एक स्वस्थ और सशक्त राष्ट्र की पहचान है,हमें अपने समाज में ऐसी चेतना जागृत करनी होगी, जिससे लोग हर घटना के पीछे का कारण पूछें। अंधविश्वास को जड़ से मिटाना और समाज को प्रगतिशील बनाना ही हमारा अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। जब हम डर को छोड़कर प्रश्न पूछना शुरू करेंगे, तभी पाखंड का अंधेरा छंटेगा और ज्ञान का सूर्य उदय होगा।*एक विशेष आह्वान*"अंधविश्वास केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक बेड़ी है, जो हमारी प्रगति को रोकती है। आइए, हम सब मिलकर इस मानसिक अंधकार को मिटाने का सामूहिक संकल्प लें। यह शपथ केवल शब्दों तक सीमित न रहे, बल्कि इसे हम अपने कार्य, व्यवहार और दैनिक जीवन में भी उतारें।जब हम स्वयं तर्क की कसौटी पर जीना शुरू करेंगे, तभी हमारा समाज और आने वाली पीढ़ियाँ पाखंड के जाल से मुक्त हो सकेंगी।उठिए! जागरूक बनिए और वैज्ञानिक चेतना के इस महायज्ञ में अपनी आहुति दीजिए।"*✋वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं मानवता संकल्प (प्रतिज्ञा)*"मैं ........................... आज यह संकल्प लेता/लेती हूँ कि:मैं अपने जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाऊँगा/अपनाऊँगी और किसी भी बात को बिना तर्क या प्रमाण के स्वीकार नहीं करूँगा/करूँगी।मैं समाज में व्याप्त अंधविश्वास, पाखंड और छद्म विज्ञान के विरुद्ध जागरूक रहूँगा/रहूँगी और दूसरों को भी इनके प्रति सचेत करूँगा/करूँगी।मैं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51ए (एच) के अनुरूप अपने भीतर 'प्रश्न पूछने की जिज्ञासा' (Spirit of Inquiry) और 'सुधार की भावना' को जीवित रखूँगा/रखूँगी।मैं मानवता को सर्वोपरि मानूँगा/मानूँगी और जाति, धर्म या रूढ़ियों के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव या शोषण का समर्थन नहीं करूँगा/करूँगी।मैं डर या लालच में आकर किसी भी 'कथित चमत्कार' या 'ढोंगी बाबाओं' के जाल में नहीं फँसूँगा/फँसूँगी और अपने विवेक से निर्णय लूँगा/लूँगी।मैं एक ऐसे समाज के निर्माण में सहयोग दूँगा/दूँगी जो भयमुक्त, तर्कशील और प्रगतिशील हो।मेरा विवेक ही मेरा पथ-प्रदर्शक है। *जय विज्ञान, जय संविधान**लेखक*सोहनलाल सिंगारियाप्राचार्य (RES),सामाजिक कार्यकर्ता, ब्यावरप्रदेश उपसभा अध्यक्ष, राजस्थान शिक्षक संघ (अंबेडकर)सम्पर्क सूत्र: 9462260179sohanlalsingaria@gmail.com

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*युवा शक्ति का आह्वान: तमाशबीन नहीं, समाज परिवर्तन के सूत्रधार बनें* इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि जब-जब समाज में वैचारिक जड़ता आई है, जब-जब रूढ़िवादिता ने प्रगति के मार्ग को अवरुद्ध किया है, तब-तब युवाओं की ऊर्जा ने ही क्रांति का शंखनाद किया है। आज का युवा तकनीक, सूचना और असीम स्वप्नों से लैस है। उसके पास दुनिया को बदलने के लिए 'डिजिटल हथियार' हैं, लेकिन विडंबना यह है कि वह अपनी इस प्रचंड शक्ति को केवल व्यक्तिगत उन्नति, सोशल मीडिया के लाइक्स, रील और दिखावे की दुनिया में खपा रहा है। युवा वह शक्ति है जिसके पास ऊर्जा है, सपने हैं और सबसे बड़ा-समय है। लेकिन क्या यह समय केवल उपभोग के लिए है? *महात्मा ज्योतिबा राव फुले ने आज से डेढ़ सदी पहले चेतावनी देते हुए कहा था* "विद्या बिना मति गयी, मति बिना नीति गयी, नीति बिना गति गयी, गति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र टूटे, *इतने अनर्थ एक अविद्या ने किए।* *फुले जी* का यह संदेश आज के सन्दर्भ में और भी गहरा हो जाता है। आज हमारे युवाओं के पास डिग्रियाँ तो हैं, लेकिन क्या वह 'विद्या' है जो समाज की नीति और गति बदल सके? यदि हमारी शिक्षा हमें केवल एक वेतनभोगी कर्मचारी बनाती है और समाज में व्याप्त गैर-बराबरी को देखने की दृष्टि नहीं देती, तो वह शिक्षा अधूरी है। *मौन की साझेदारी: एक नैतिक संकट* समाज में बुराई इसलिए नहीं फलती-फूलती कि बुरे लोग सक्रिय हैं, बल्कि इसलिए फलती है क्योंकि समाज का सबसे ऊर्जावान हिस्सा यानी *'युवा' और 'शिक्षित वर्ग' मौन है।* *बाबा साहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने आजीवन संघर्ष के बाद हमें एक मंत्र दिया था* "शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।" यहाँ शिक्षित होने का अर्थ केवल अक्षर ज्ञान प्राप्त करना नहीं है, बल्कि अपने अधिकारों, अपने इतिहास और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होना है। अक्सर देखा गया है कि युवा वर्ग अपनी ऊर्जा को पार्टी, जॉब और फॉलोअर्स बढ़ाने में लगा देता है, जबकि असली ताकत तब बनती है जब यह ऊर्जा समाज की दिशा बदलने में लगे। *समाज कभी अपने आप आगे नहीं बढ़ता* उसे आगे बढ़ाने के लिए कुछ लोग लड़ते हैं, कुछ लिखते हैं, कुछ बोलते हैं और कुछ साथ खड़े रहते हैं। *लेकिन सबसे खतरनाक वह वर्ग है, जो न लड़ता है, न लिखता है, न बोलता है—वह बस किनारे बैठकर 'तमाशा' देखता है।* ऐसे लोग इतिहास में कभी बदलाव के सूत्रधार नहीं बने, वे सिर्फ दूसरों के संघर्ष पर राय देने वाले 'दर्शक' बनकर रह गए। *परिवर्तन के चार अनिवार्य मार्ग* समाज को उन्नति की ओर ले जाने के लिए युवाओं को चार स्तरों पर अपनी भूमिका तय करनी होगी: *लड़ना* इसका अर्थ केवल शारीरिक युद्ध नहीं, बल्कि अन्याय, कुरीतियों और भेदभाव के विरुद्ध धरातल पर वैचारिक और संवैधानिक संघर्ष है। *लिखना* लेखनी में वह ताकत है जो सोए हुए समाज को जगा सकती है। यदि आप लड़ नहीं सकते, तो अपनी कलम उठाइए और समाज की सच्चाई को दुनिया के सामने लाइए। *बोलना* तर्क और तथ्यों के साथ अपनी बात निडर होकर रखना। चुप्पी तोड़ना ही बदलाव की पहली शर्त है। *साथ देना* जो लोग निस्वार्थ भाव से समाज की उन्नति के लिए लड़ रहे हैं, उनका मनोबल बढ़ाना और उनके पीछे चट्टान की तरह खड़े होना। यदि आप इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते, तो कम से कम उन लोगों का *उपहास मत उड़ाइए जो आपके हिस्से की लड़ाई लड़ रहे हैं।* समाज की सबसे बड़ी त्रासदी विरोध नहीं, बल्कि अपने ही लोगों द्वारा किया गया तिरस्कार और चरित्रहनन है। *सवालों की महत्ता: प्रगति की पहली सीढ़ी* जब कोई युवा समाज सुधार की बात करता है या स्थापित व्यवस्था पर सवाल उठाता है, तो उसे अक्सर 'विद्रोही' या 'समाज विरोधी' कहकर चुप कराने की कोशिश की जाती है। *हमें यह समझना होगा कि सवाल समाज को कमजोर नहीं करते, बल्कि उसे मानसिक गुलामी की बेड़ियों से आजाद करते हैं।* जो समाज सवालों से डरता है, वह कभी प्रगति नहीं कर सकता; वह सिर्फ परंपराओं के बोझ तले दबा रह जाता है। *बाबा साहेब ने स्पष्ट कहा था* "छीने हुए अधिकार भीख में नहीं मिलते, अधिकार वसूल करने पड़ते हैं।" और यह वसूली तभी संभव है जब युवा वर्ग 'तमाशबीन' बनना छोड़कर वैचारिक रूप से समृद्ध और मुखर हो। समाज के प्रति आपकी वफादारी किसी व्यक्ति विशेष या अंध-परंपरा से नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और मानवीय समानता से होनी चाहिए। *आज के युवा का संकल्प और भविष्य की राह* आज का युवा केवल एक 'उपभोक्ता' नहीं है, वह भविष्य का 'निर्माता' है। वह सिर्फ सपने देखने वाला नहीं, बल्कि उन सपनों को धरातल पर उतारने वाला बदलाव का अग्रदूत है। आज समाज को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो यह समझें कि समाज सुधार किसी एक नेता, लेखक या संगठन की जागीर नहीं है, बल्कि यह हमारा सामूहिक नैतिक कर्तव्य है। *मेरे युवा साथियों,* आज आपसे मेरा आह्वान है कि एक छोटा सा संकल्प लें: *"मैं समाज की उन्नति की इस लड़ाई में अपने स्तर पर योगदान दूंगा। मैं अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज उठाऊंगा और जहाँ संभव होगा, सही के पक्ष में खड़ा होऊंगा।"* इतिहास तालियाँ बजाने वालों को नहीं, बल्कि सच बोलने वालों और संघर्ष करने वालों को याद रखता है। *आपका एक छोटा सा कदम, एक छोटा सा लेख या एक छोटा सा विरोध पूरे कारवां की दिशा बदल सकता है।* उठो, चेतो और समाज की उन्नति के सारथी बनो। *याद रखिए, यदि आप हर गलत बात पर चुप रहते हैं, तो आप भी उस गलत के उतने ही साझेदार बन जाते हैं।* अपनी ऊर्जा को सही दिशा दें और एक ऐसे भारत के निर्माण में भागीदार बनें जिसका सपना महात्मा फुले और बाबा साहेब अंबेडकर ने देखा था। *जय भारत, जय भीम, नमो बुद्धाय* विनीत: सोहनलाल सिंगारिया प्राचार्य (RES) एवम सामाजिक कार्यकर्ता प्रदेश उप सभा अध्यक्ष, राजस्थान शिक्षक संघ (अंबेडकर) संपर्क: 94622-60179 Email sohanlalsingaria@gmail.com

*माता रमाबाई: त्याग, तपस्या और मौन बलिदान की प्रतिमूर्ति*जब भी इतिहास डॉ. भीमराव अंबेडकर को 'संविधान निर्माता' और 'शोषितों के मसीहा' के रूप में याद करता है, तब एक मौन लेकिन अत्यंत तेजस्वी अध्याय स्वतः ही उभर कर सामने आता है। वह अध्याय है—*त्याग की प्रतिमूर्ति माता रमाबाई अंबेडकर का जीवन।* माता रमाबाई केवल बाबा साहब की अर्धांगिनी नहीं थीं, बल्कि वे उस महान सामाजिक क्रांति की आधारशिला और प्राणशक्ति थीं।*संघर्ष की मूक आधारशिला*माता रमाबाई का जीवन शब्दों या भाषणों का मोहताज नहीं, बल्कि निरंतर सहे गए कष्टों और अटूट धैर्य की एक जीवंत गाथा है। जिस समय डॉ. अंबेडकर वैश्विक स्तर पर शिक्षा, लेखन और सामाजिक चेतना की मशाल जला रहे थे, उस समय माता रमाबाई घर की जर्जर दीवारों के बीच अभावों से लड़ रही थीं।उनका त्याग कोई साधारण त्याग नहीं था। उन्होंने अपने सुख, स्वास्थ्य और यहाँ तक कि अपनी बुनियादी जरूरतों को भी तिलांजलि दे दी ताकि बाबा साहब का मार्ग निष्कंटक बना रहे। कई बार तो घर में अन्न का दाना तक नहीं होता था, लेकिन उनके स्वाभिमान और समर्पण ने कभी बाबा साहब को इस संघर्ष से पीछे हटने नहीं दिया। वे जानती थीं कि यदि भीमराव रुक गए, तो करोड़ों शोषितों की मुक्ति का स्वप्न हमेशा के लिए अधूरा रह जाएगा।*संतानों का बलिदान: एक हृदयविदारक सत्य*यह विषय केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि उस समय की सामाजिक और आर्थिक विषमता का क्रूर आईना है। माता रमाबाई और बाबा साहब की संतानों ने असमय ही इस दुनिया को विदा कह दिया। वे बच्चे केवल एक परिवार के सदस्य नहीं थे, बल्कि वे उस व्यवस्था की भेंट चढ़ गए जिसके खिलाफ बाबा साहब लड़ रहे थे।गरीबी और उचित चिकित्सा के अभाव में एक माँ अपनी आँखों के सामने अपने जिगर के टुकड़ों को एक एक कर खोती रही, लेकिन उन्होंने अपने दुख को कभी बाबा साहब के मिशन की बाधा नहीं बनने दिया। *यह असाधारण मातृत्व था।* उन्होंने अपने बच्चों को खोया, लेकिन कभी आंदोलन को दोष नहीं दिया, न ही कभी बाबा साहब के संकल्प को कमजोर पड़ने दिया। *उनके बच्चे संघर्ष की उस राह के 'अनदेखे शहीद' थे, जिसकी कीमत समाज के उत्थान के लिए चुकाई गई।**संविधान निर्माण के पीछे की शक्ति*अक्सर कहा जाता है कि डॉ. अंबेडकर ने भारत को संविधान दिया, लेकिन यह भी सत्य है कि उस 'अंबेडकर' को गढ़ने में माता रमाबाई का अतुलनीय योगदान था। यदि माता रमाबाई घर की जिम्मेदारियों का बोझ अपने कंधों पर न उठातीं, यदि वे अभावों को मुस्कुराहट के साथ न सहतीं, तो शायद विश्व को इतना महान विधिवेत्ता और विचारक नहीं मिल पाता।*संविधान* केवल शब्दों और धाराओं से नहीं बना है। यह बना है एक स्त्री के असीम धैर्य से, एक माँ के आंसुओं से और उन बच्चों की मासूम आहों से जिन्होंने संघर्ष की वेदी पर दम तोड़ दिया। *इसलिए, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर वास्तव में माता रमाबाई के ऐतिहासिक त्याग और तपस्या की ही देन हैं।**निष्कर्ष*आज जब हम स्वतंत्र भारत और उसके संवैधानिक अधिकारों की बात करते हैं, तो हमें उन मौन बलिदानों को भी नमन करना चाहिए जो इतिहास के पन्नों में कहीं ओझल रह गए। माता रमाबाई और उनके बच्चों का बलिदान बाबा साहब के आंदोलन की वह ऊर्जा है जिसने करोड़ों दीप प्रज्वलित किए।*नमन है, उस महा माता को, जिसने खुद को मिटाकर समाज को एक नया जीवन दिया।*लेखक:सोहनलाल सिंगारियाप्राचार्य (RES) सामाजिक कार्यकर्ता ब्यावरप्रदेश उप सभा अध्यक्ष राजस्थान शिक्षक संघ अम्बेडकर

*भारत रत्न डॉ. अम्बेडकर,आधुनिक भारत के शिल्पी और सामाजिक न्याय के प्रकाश-पुंज*"अन्याय से लड़ते हुए मर जाना, उस अन्याय को सहते रहने से कहीं बेहतर है।" डॉ. भीमराव आंबेडकर के ये शब्द केवल एक विचार नहीं, बल्कि करोड़ों शोषितों और वंचितों के लिए जीवन का मंत्र हैं। आज जब हम एक प्रगतिशील भारत की बात करते हैं, तो बाबासाहेब का नाम उस नींव के पत्थर के रूप में उभरता है, जिस पर हमारे लोकतंत्र की भव्य इमारत खड़ी है।*1 शिक्षा: सामाजिक परिवर्तन का अमोघ अस्त्र*बाबासाहेब ने शिक्षा को केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और चेतना का आधार माना। उनका वह कालजयी संदेश आज भी गूंजता है: "शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा वह दहाड़ेगा।" उनका स्पष्ट मत था कि अज्ञानता ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। शिक्षा के बिना कोई भी समाज अपनी दासता की बेड़ियों को नहीं पहचान सकता और न ही उन्हें तोड़ने का साहस जुटा सकता है।*2 संविधान निर्माण: राष्ट्र की धड़कन*भारत के संविधान निर्माता के रूप में बाबासाहेब ने एक ऐसे राष्ट्र का स्वप्न देखा जहाँ कानून का शासन हो। उन्होंने कहा था, "संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक जीवन जीने का तरीका है।" उन्होंने एक ऐसा ढांचा तैयार किया जहाँ "स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा" केवल शब्द न रहकर संवैधानिक अधिकार बनें। वे जानते थे कि "कानून और व्यवस्था, सामाजिक स्वास्थ्य का आधार है" और इसी आधार पर एक न्यायपूर्ण समाज खड़ा हो सकता है।*3 महिला अधिकार और हिंदू कोड बिल: एक क्रांतिकारी विजन*डॉ. अम्बेडकर ने समाज की प्रगति का पैमाना महिलाओं की स्थिति को माना। उन्होंने कहा, "मैं किसी समुदाय की प्रगति को उस प्रगति से मापता हूँ जो महिलाओं ने हासिल की है।" स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में उन्होंने 'हिंदू कोड बिल' पेश किया, जो महिलाओं को संपत्ति, तलाक और उत्तराधिकार में समान अधिकार देने का ऐतिहासिक प्रयास था। जब रूढ़िवादी ताकतों ने इसका विरोध किया, तो उन्होंने अपने पद का त्याग कर दिया। यह त्याग उनके इस विचार को पुष्ट करता है कि महिलाओं की प्रगति के बिना समाज की प्रगति असंभव है।*4 जातिवाद का उन्मूलन और सामाजिक संरचना*बाबासाहेब ने जाति को एक मानसिक बीमारी माना। उनके अनुसार, "जाति एक मानसिकता है, जो सामाजिक एकता को नष्ट करती है"। उन्होंने समाज को प्रेरित किया कि "जाति-पाति की दीवारें सामाजिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा हैं"। उनका पूरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक महान व्यक्ति की पहचान उसकी सेवा से होती है, न कि उसकी जाति से।*5 आत्मसम्मान और अनवरत संघर्ष*उन्होंने समाज को कभी लाचार होने की सलाह नहीं दी, बल्कि संघर्ष का आह्वान किया। उन्होंने सिखाया कि "मनुष्य का सबसे बड़ा अधिकार है उसका आत्मसम्मान" और "हमें अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए, क्योंकि कोई दूसरा हमें वह देगा नहीं"। उनका त्रिसूत्रीय मार्ग—"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो"—आज भी हर न्यायप्रिय व्यक्ति का मार्गदर्शक है।*उपसंहार*अंत में, डॉ. अम्बेडकर के शब्दों में कहें तो, "जो समाज अपने इतिहास को भूल जाता है, वह प्रगति नहीं कर सकता"। आज हमारे पास बाबासाहेब के रूप में एक महान इतिहास और उनके विचारों के रूप में एक स्वर्णिम भविष्य है। बाबा साहब को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बताए "मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है" के मार्ग पर चलें और एक समतामूलक समाज के निर्माण में अपना योगदान दें।*जय भीम, नमो बुद्धाय, जय संविधान* *लेखक*सोहन लाल सिंगारिया प्राचार्य (RES) एवं सामाजिक कार्यकर्ता ब्यावर प्रदेश उपसभा अध्यक्ष राजस्थान शिक्षक संघ अम्बेडकर