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*अंधविश्वास: विवेक की कसौटी पर एक मानसिक रोग और उसका समाधान*आज का युग विज्ञान और तकनीक का स्वर्ण काल माना जाता है, जहाँ मानव मंगल ग्रह पर बस्तियां बसाने की योजना बना रहा है। किंतु विडंबना यह है कि आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग 'पोंगा पंथ' और 'अंधविश्वास' की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। अनपढ़ तो दूर, उच्च शिक्षा प्राप्त लोग भी अक्सर इन भ्रामक जालों में फंसे नजर आते हैं। वास्तव में, तर्क जहाँ रुक जाता है, अंधविश्वास वहीं से शुरू होता है।*अंधविश्वास का आधार: भय और अज्ञानता*अंधविश्वास कोई दैवीय शक्ति नहीं, बल्कि एक मानसिक रोग की तरह है जिसका समय पर इलाज आवश्यक है। इसके पनपने के मुख्य कारणों में शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और वैज्ञानिक चेतना की अनुपस्थिति प्रमुख है। जब व्यक्ति के मन में "कुछ गलत हो जाने का डर" घर कर लेता है, तब वह पाखंडियों का आसान शिकार बन जाता है। हमें यह समझना होगा कि हाथ की लकीरों से नहीं, बल्कि मेहनत और विज्ञान से ही तकदीर बदलती है।*संवैधानिक और नैतिक उत्तरदायित्व*भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51ए (एच) प्रत्येक नागरिक को यह कर्तव्य सौंपता है कि वह "वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और सुधार की भावना" का विकास करे। शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने भी स्पष्ट किया था कि धार्मिक अंधविश्वास और कट्टरपन हमारी प्रगति के सबसे बड़े रोड़े हैं। जो विचार आजाद ख्यालों और तर्क को बर्दाश्त नहीं कर सकते, उन्हें समाज के हित में समाप्त हो जाना चाहिए। पाखंडी बाबाओं से नाता तोड़ना और तर्क-विवेक से नाता जोड़ना ही असली राष्ट्रभक्ति है।*चमत्कार या चालाकी*अक्सर 'बाबागिरी', 'ज्योतिष' और 'भूत-प्रेत' के नाम पर समाज का आर्थिक और मानसिक शोषण किया जाता है। जिसे हम 'चमत्कार' समझकर नतमस्तक हो जाते हैं, वह अक्सर आँखों का धोखा या छद्म विज्ञान (Pseudo-science) होता है। *डॉ. अब्राहम टी. कोवूर* के शब्दों में, "जो व्यक्ति बिना जांच-पड़ताल किए चमत्कार में विश्वास कर लेता है, वह स्वयं को मूर्खता की श्रेणी में खड़ा करता है।" हमें यह याद रखना चाहिए कि जादू-टोना और चमत्कार सब बेकार हैं, वैज्ञानिक सोच ही जीवन का असली आधार है।वर्तमान में जोर-शोर से प्रचलित एक पंक्ति कटु सत्य को उजागर करती है,*इंसान बिना मुहूर्त के पैदा होता है, लेकिन पूरी जिंदगी 'शुभ मुहूर्त' के फेर में फंसा रहकर अंततः एक दिन बिना मुहूर्त के ही संसार से विदा हो जाता है।"**निष्कर्ष*अंधविश्वास मुक्त समाज ही एक स्वस्थ और सशक्त राष्ट्र की पहचान है,हमें अपने समाज में ऐसी चेतना जागृत करनी होगी, जिससे लोग हर घटना के पीछे का कारण पूछें। अंधविश्वास को जड़ से मिटाना और समाज को प्रगतिशील बनाना ही हमारा अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। जब हम डर को छोड़कर प्रश्न पूछना शुरू करेंगे, तभी पाखंड का अंधेरा छंटेगा और ज्ञान का सूर्य उदय होगा।*एक विशेष आह्वान*"अंधविश्वास केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक बेड़ी है, जो हमारी प्रगति को रोकती है। आइए, हम सब मिलकर इस मानसिक अंधकार को मिटाने का सामूहिक संकल्प लें। यह शपथ केवल शब्दों तक सीमित न रहे, बल्कि इसे हम अपने कार्य, व्यवहार और दैनिक जीवन में भी उतारें।जब हम स्वयं तर्क की कसौटी पर जीना शुरू करेंगे, तभी हमारा समाज और आने वाली पीढ़ियाँ पाखंड के जाल से मुक्त हो सकेंगी।उठिए! जागरूक बनिए और वैज्ञानिक चेतना के इस महायज्ञ में अपनी आहुति दीजिए।"*✋वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं मानवता संकल्प (प्रतिज्ञा)*"मैं ........................... आज यह संकल्प लेता/लेती हूँ कि:मैं अपने जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाऊँगा/अपनाऊँगी और किसी भी बात को बिना तर्क या प्रमाण के स्वीकार नहीं करूँगा/करूँगी।मैं समाज में व्याप्त अंधविश्वास, पाखंड और छद्म विज्ञान के विरुद्ध जागरूक रहूँगा/रहूँगी और दूसरों को भी इनके प्रति सचेत करूँगा/करूँगी।मैं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51ए (एच) के अनुरूप अपने भीतर 'प्रश्न पूछने की जिज्ञासा' (Spirit of Inquiry) और 'सुधार की भावना' को जीवित रखूँगा/रखूँगी।मैं मानवता को सर्वोपरि मानूँगा/मानूँगी और जाति, धर्म या रूढ़ियों के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव या शोषण का समर्थन नहीं करूँगा/करूँगी।मैं डर या लालच में आकर किसी भी 'कथित चमत्कार' या 'ढोंगी बाबाओं' के जाल में नहीं फँसूँगा/फँसूँगी और अपने विवेक से निर्णय लूँगा/लूँगी।मैं एक ऐसे समाज के निर्माण में सहयोग दूँगा/दूँगी जो भयमुक्त, तर्कशील और प्रगतिशील हो।मेरा विवेक ही मेरा पथ-प्रदर्शक है। *जय विज्ञान, जय संविधान**लेखक*सोहनलाल सिंगारियाप्राचार्य (RES),सामाजिक कार्यकर्ता, ब्यावरप्रदेश उपसभा अध्यक्ष, राजस्थान शिक्षक संघ (अंबेडकर)सम्पर्क सूत्र: 9462260179sohanlalsingaria@gmail.com
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