*सावित्रीबाई फुले स्त्री शिक्षा और सामाजिक क्रांति की अग्रदूत*`
*पहला बालिका विद्यालय*
1 जनवरी 1848
महात्मा ज्योतिराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने पुणे के भिड़े वाड़ा में भारत का पहला बालिका विद्यालय खोला।
उस समय सावित्रीबाई की उम्र मात्र 17 वर्ष थी।
प्रारंभ में केवल 9 बालिकाएँ पढ़ने आईं, जो धीरे-धीरे बढ़कर 25 हो गईं।
1851 तक फुले दंपत्ति ने पुणे में तीन और विद्यालय खोले।
इन विद्यालयों का उद्देश्य महिलाओं को शिक्षा देकर समाज में उनका स्थान और सम्मान सुनिश्चित करना था।
*सामाजिक व्यवस्था को चुनौती*
उस दौर में स्त्रियों और शूद्रों को शिक्षा से वंचित रखा गया था। धर्मग्रंथों में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि स्त्री और शूद्र अध्ययन न करें।
सावित्रीबाई फुले ने इस व्यवस्था को खुली चुनौती दी और आजीवन स्त्रियों तथा शूद्र-अतिशूद्रों की मुक्ति के लिए संघर्ष किया।
*शिक्षा की यात्रा*
जन्म : 3 जनवरी 1831, नायगांव (जिला सतारा, महाराष्ट्र)
*विवाह*
9 वर्ष की आयु में 13 वर्षीय ज्योतिराव फुले से।
*शिक्षा*
पति ज्योतिराव फुले के मार्गदर्शन में अहमदनगर और पुणे में अध्यापक प्रशिक्षण प्राप्त किया।
*सहयोगी*
फातिमा शेख, जिन्होंने उनके साथ मिलकर अध्यापन का कार्य किया।
*संघर्ष और साहस*
सावित्रीबाई जब विद्यालय जातीं तो, समाज के लोग उन पर पत्थर और गोबर फेंकते।
*वे शांत भाव से कहतीं*
“मैं आपकी बहनों को पढ़ा रही हूँ। आपके पत्थर और गोबर मुझे रोक नहीं सकते, बल्कि प्रेरणा देते हैं।”
वे अतिरिक्त साड़ी साथ रखतीं ताकि विद्यालय पहुँचकर बदल सकें। यह उनका अदम्य साहस था।
*सामाजिक सुधार*
1863 : फुले दंपत्ति ने विधवाओं और उनके बच्चों के लिए बालहत्या प्रतिबंधक गृह स्थापित किया।
उन्होंने विधवाओं को गुप्त रूप से सुरक्षित प्रसव की सुविधा दी और बच्चों की देखभाल स्वयं की।
*यशवंत नामक एक विधवा के बच्चे को उन्होंने अपने पुत्र की तरह पाला।*
*सत्यशोधक समाज*
1873 : ज्योतिराव फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की।
1891–1897 : ज्योतिराव की मृत्यु के बाद सावित्रीबाई ने इसका नेतृत्व किया।
उन्होंने सत्यशोधक विवाह पद्धति को भी समाज में लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
*साहित्यिक योगदान*
1854 : पहला काव्य संग्रह काव्य फुले प्रकाशित।
1892 : दूसरा संग्रह बावन काशी सुबोध रतनाकर प्रकाशित, जिसमें 52 कविताएँ थीं।
उनके भाषण और पत्र भी सामाजिक चेतना के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं।
*अंतिम समय*
1896 : अकाल पीड़ितों की सेवा में दिन-रात जुटीं।
1897 : पुणे में प्लेग महामारी के दौरान सेवा करते हुए स्वयं संक्रमित हुईं।
10 मार्च 1897 समाज सेवा करते-करते उनका निधन हुआ।
*निष्कर्ष*
सावित्रीबाई फुले केवल भारत की पहली महिला शिक्षिका ही नहीं थीं, बल्कि वे स्त्री शिक्षा, सामाजिक
न्याय और समानता की प्रतीक थीं।
*उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि शिक्षा ही समाज परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार है।*
जय ज्योतिबा
जय माता सावित्रीबाई
लेखक :
सोहनलाल सिंगारिया
प्राचार्य (RES)
सामाजिक कार्यकर्ता
प्रदेश उप सभा अध्यक्ष
राजस्थान शिक्षक संघ अंबेडकर
94622-60179
sohanlalsingaria@gmail.com
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