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*धम्म और संविधान: मानवीय गरिमा और सामाजिक पुनर्गठन का मार्ग*लेखकसोहनलाल सिंगारिया प्राचार्य (RES)सामाजिक कार्यकर्ता प्रदेश उपसभा अध्यक्ष राजस्थान शिक्षक संघ अंबेडकर 9462260179sohanlalsingaria@gmail.com*प्रस्तावना*बोधिसत्व डॉ. बी.आर. अंबेडकर के लिए *बुद्ध धम्म केवल व्यक्तिगत मोक्ष या उपासना की पद्धति नहीं थी, बल्कि यह समाज को न्यायपूर्ण बनाने का एक विज्ञान था।* बाबा साहब का मानना था कि जिस "स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व" की बात फ्रांसीसी क्रांति करती है, उसकी जड़ें बुद्ध के धम्म में बहुत गहरी हैं। *आज के दौर में बुद्ध के सिद्धांत और भारतीय संविधान के प्रावधान एक समतामूलक समाज के निर्माण में एक-दूसरे के पूरक की भूमिका निभाते हैं।*1. *समानता बनाम जातिवाद*जाति व्यवस्था ने भारतीय समाज को 'श्रेणीबद्ध असमानता' में बांट दिया था। बुद्ध और संविधान दोनों इस विषमता पर प्रहार करते हैं:*धम्म का नजरिया* बुद्ध ने जन्म पर आधारित श्रेष्ठता को नकारते हुए कहा था— "न जच्चा वसलो होति, न जच्चा होति ब्राह्मणो"। इसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति जन्म से 'नीच' या 'ब्राह्मण' नहीं होता, बल्कि व्यक्ति के कर्म और उसका चरित्र ही उसकी महानता तय करते हैं।*संवैधानिक शक्ति*इसी मानवीय समानता को कानूनी रूप देने के लिए संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष सबको बराबर रखता है और अनुच्छेद 17 छुआछूत जैसी अमानवीय प्रथा को जड़ से समाप्त कर उसे दंडनीय अपराध बनाता है।2. *स्वतंत्रता बनाम मानसिक गुलामी*अंधविश्वास और पाखंड मानसिक गुलामी के सबसे बड़े औजार हैं। बाबा साहब ने धम्म के माध्यम से विवेक की स्वतंत्रता पर जोर दिया।*धम्म का नजरिया* बुद्ध का अंतिम संदेश था, "अप्प दीपो भव"(अपना दीपक स्वयं बनो)। यह उपदेश मनुष्य को तर्कहीन परंपराओं और किसी बाहरी चमत्कार के भरोसे रहने के बजाय अपनी बुद्धि और विवेक का उपयोग करने के लिए प्रेरित करता है।*संवैधानिक शक्ति*संविधान का अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की आजादी देता है, जबकि अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता देता है, जो व्यक्ति को अपनी पसंद का विचार और धर्म चुनने का संवैधानिक अधिकार प्रदान करता है।3. *बंधुत्व बनाम ऊंच-नीच*लोकतंत्र केवल सरकार का एक रूप नहीं है, बल्कि यह मूलतः साथ रहने और दूसरों के प्रति सम्मान रखने का एक तरीका है।*धम्म का नजरिया* बुद्ध ने 'मैत्री' और 'करुणा' को समाज का आधार बनाया। जहाँ जाति समाज को तोड़ती है, वहीं मैत्री उसे जोड़ती है।*संवैधानिक शक्ति* भारतीय संविधान की प्रस्तावना में'बंधुत्व' को राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए अनिवार्य माना गया है। बिना भाईचारे के समानता और स्वतंत्रता अधूरी हैं।*वर्तमान सामाजिक चुनौतियाँ और समाधान*आज भी समाज में भेदभाव और शोषण की चुनौतियाँ मौजूद हैं। बाबा साहब ने इन चुनौतियों से लड़ने के लिए हमें तीन शस्त्र दिए हैं:*शिक्षा का महत्व* शिक्षा ही वह माध्यम है जिससे 'प्रज्ञा' (सही दृष्टि) जागृत होती है। *ज्ञान ही वह शक्ति है* जो सदियों पुरानी मानसिक बेड़ियों को काट सकती है।*संवैधानिक जागरूकता*एक जागरूक नागरिक के रूप में कानून की जानकारी (जैसे RTI, SC/ST Act) रखना अनिवार्य है। संविधान हमें केवल अधिकार नहीं देता, बल्कि शोषण के खिलाफ सुरक्षा कवच भी प्रदान करता है।*धम्म का आचरण*अपने भीतर 'आत्म-सम्मान' पैदा करना और दूसरों के प्रति 'मैत्री' भाव रखना सामाजिक न्याय की पहली शर्त है।*निष्कर्ष**बाबा साहब का कालजयी नारा* "शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो" वास्तव में बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का ही आधुनिक और व्यावहारिक स्वरूप है।*शिक्षित बनो* अर्थात प्रज्ञा और ज्ञान प्राप्त करो।*संगठित रहो*अर्थात शील और मैत्री के साथ सामूहिक शक्ति बनो।*संघर्ष करो*अर्थात अपने अधिकारों और न्याय के लिए दृढ़ निश्चय (अधिट्ठान) के साथ आगे बढ़ो।*अतः, बुद्ध धम्म और संविधान का संगम ही वह मार्ग* *हैं,जिससे भारत एक 'प्रबुद्ध भारत' बन सकता है।**लेखक*सोहनलाल सिंगरियाप्राचार्य (RES)सामाजिक कार्यकर्ता प्रदेश उपसभा अध्यक्ष राजस्थान शिक्षक संघ अंबेडकर 9462260179sohanlalsingaria@gmail.com
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