धर्मगुरु स्वामी ज्ञान स्वरूप जी महाराज रेगर समाज के आध्यात्मिक सूर्य 1895-1985
*धर्मगुरु स्वामी ज्ञानस्वरूप जी महाराज: रैगर समाज के आध्यात्मिक सूर्य*
(1895 – 1985)
19वीं शताब्दी के अंत में, जब भारतीय समाज अंग्रेजी दासता और आंतरिक कुरीतियों के अंधकार में डूबा था, तब राजस्थान की वीर धरा पर एक ऐसी दिव्य ज्योति का प्राकट्य हुआ जिसने रैगर समाज को आत्म-सम्मान और ज्ञान का मार्ग दिखाया। वे महापुरुष थे— स्वामी ज्ञानस्वरूप जी महाराज।
*1. जन्म एवं बाल्यकाल*
स्वामी जी का जन्म 21 अक्टूबर 1895 (विक्रम संवत 1952, अश्विन शुक्ला त्रयोदशी) को अजमेर जिले के वर्तमान में ब्यावर जिला के ग्राम गोहाना (ब्यावर के समीप) में हुआ। उनके पिता श्री उदा राम जी और माता श्रीमती मेदी बाई 'रामस्नेही संप्रदाय' के अनन्य भक्त थे।
बचपन में उन्हें 'गेना राम' के नाम से पुकारा जाता था। तीन भाइयों में सबसे छोटे होने के कारण वे सबके लाड़ले थे, लेकिन नियति ने उनके लिए एक महान आध्यात्मिक पथ चुना था।
*2. वैराग्य और दीक्षा*
बचपन से ही गेनाराम जी की स्मरण शक्ति अद्भुत थी। उन्होंने मात्र 5-7 वर्ष की आयु में हिंदी में विशेष योग्यता प्राप्त कर ली। उनके हृदय में वैराग्य की लौ जल रही थी, जिसे देखकर उनकी माता सशंकित रहती थीं। एक बार जब उनके हाथ से योगवशिष्ठ जैसा ग्रंथ छीना गया, तब भी उनकी लगन कम नहीं हुई।
अंततः, जीवन की सार्थकता की खोज में वे घर त्यागकर मीरपुर खास (सिंध) पहुँचे। वहाँ स्वामी मौजी राम जी महाराज की कठोर परीक्षा के बाद, 12 अगस्त 1917 (रक्षाबंधन) को उन्होंने दीक्षा ली। उनका नया नाम 'स्वामी ज्ञानस्वरूपानन्द' रखा गया।
*3. समाज सुधार और शैक्षणिक क्रांति*
स्वामी जी ने भारत भ्रमण के दौरान समाज की आर्थिक और सामाजिक दुर्दशा देखी। *उन्होंने महसूस किया कि शिक्षा के बिना कोई भी कौम सभ्य और संपन्न नहीं हो सकती।*
*शिक्षा का मंत्र*
उन्होंने स्पष्ट कहा, "जैसे सूर्य के बिना रात्रि का अंत नहीं होता, वैसे ही विद्या के बिना भविष्य सुखमय नहीं हो सकता।"
*छात्रावास की स्थापना*
इसी उद्देश्य से उन्होंने 1950 में जोधपुर के नागोरी गेट पर
*श्री ज्ञान गंगा छात्रावास* की नींव रखी।
*कुरीतियों पर प्रहार*
वे मांस, मदिरा और अन्य नशों के घोर विरोधी थे। उन्होंने *मृत्युभोज जैसी कुप्रथाओं को बंद करने के लिए जन-जागृति पैदा की।*
*4. अखिल भारतीय रैगर महासभा के जन्मदाता*
स्वामी जी केवल एक संत नहीं, बल्कि एक महान संगठनकर्ता थे।
उन्होंने 2 नवंबर 1944 को दौसा (जयपुर) में प्रथम अखिल भारतीय रैगर महासम्मेलन की शुरुआत ध्वजारोहण से की।
वे महासभा के जन्मदाता माने जाते हैं। उनके सानिध्य में स्वामी आत्माराम जी 'लक्ष्य' ने समाज को एक नई पहचान दी।
दिल्ली के करोल बाग स्थित श्री विष्णु मंदिर (पूर्व में गुरु मंदिर) उनके प्रवास और आध्यात्मिक चर्चाओं का मुख्य केंद्र रहा।
*5. हरिद्वार में रैगर धर्मशाला का निर्माण*
स्वामी जी और स्वामी रामानंद जी महाराज को एक बार हरिद्वार कुंभ के दौरान ठहरने में भारी कठिनाई हुई। इस अनुभव ने उन्हें झकझोर दिया। उन्होंने संकल्प लिया कि हरिद्वार में समाज की अपनी धर्मशाला होगी। देशभर के दानदाताओं के सहयोग से उन्होंने हरिद्वार में 'रैगर धर्मशाला' की स्थापना करवाई, जो आज भी समाज के यात्रियों के लिए बड़ा सहारा है।
*6. महानिर्वाण और सम्मान*
स्वामी जी ने अपने अंतिम समय का आभास पहले ही कर लिया था।
उन्होंने अपने प्रिय शिष्य स्वामी रामानंद जी 'जिज्ञासु' की प्रतीक्षा की और *25 फरवरी 1985 को पीपाड़ शहर (जोधपुर) के जिज्ञासु आश्रम में महासमाधि ली।*
*मरणोपरांत सम्मान*
1986 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने उन्हें 'रैगर रत्न' की उपाधि दी।
1988 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें 'धर्मगुरु' की उपाधि से अलंकृत किया।
*7 साहित्यिक धरोहर*
स्वामी जी ने अपने विचारों को अमर बनाने के लिए कई ग्रंथों की रचना की, श्री ज्ञानभजन प्रभाकर (जिसमें आत्मानुभूति के 400 भजन हैं)
अध ज्ञान भास्कर
संध्यादि नित्य कर्म
भक्ति प्रवेश भजनमाला
*निष्कर्ष*
स्वामी ज्ञानस्वरूप जी महाराज ने न केवल रैगर समाज को धार्मिक मार्ग दिखाया, बल्कि उसे *सामाजिक गुलामी से मुक्त कराकर स्वाभिमान से जीना सिखाया।* आज भी उनके द्वारा जलाया गया ज्ञान का दीपक समाज का पथ प्रदर्शन कर रहा है। *शत शत नमन “
*नोट*
*आभार साधुवाद*
इस लेख से संबंधित जानकारी रेगर समाज वेबसाइट से ली गई है
https://www.theraigarsamaj.com/gyanswaroopji/
साभार
*लेखक*
सोहनलाल सिंगारिया
प्राचार्य (RES) एवं
सामाजिक कार्यकर्ता ब्यावर
94622-60179
sohanlalsingaria@gmail.com
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