पुनर्जन्म और भाग्यवाद मानसिक गुलामी की बेड़ियां और सामाजिक षड्यंत्र

*पुनर्जन्म और भाग्यवाद मानसिक गुलामी की बेड़ियां और सामाजिक षड्यंत्र* लेख 

*लेखक*
सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य
सामाजिक कार्यकर्ता, ब्यावर
94622-60179
sohanlalsingaria@gmail.com 

*प्रस्तावना*
वैचारिक दासता का मूल आधार
*"अनत्तो पाकपा निरिस्सरो"* 
 यह बुद्ध धम्म और मानवतावादी दर्शन का वह सार है जो उदघोष करता है, कि यह संसार किसी अदृश्य ईश्वर या अलौकिक शक्ति द्वारा संचालित नहीं है। 

यहाँ कुछ भी 'अपरिवर्तनशील' नहीं है। मानव समाज में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह कर्म-कारण के सिद्धांतों और मानवीय व्यवस्थाओं का परिणाम है।

परंतु, विडंबना यह है कि हज़ारों वर्षों से भारतीय समाज को एक ऐसी वैचारिक अफीम पिलाई गई, जिसने मनुष्य की सोचने-समझने की शक्ति को कुंद कर दिया। 

मानव सभ्यता के इतिहास में शोषण के जितने भी औज़ार विकसित किए गए, उनमें *'पुनर्जन्म' और 'भाग्यवाद'* सबसे घातक हैं।

 ये केवल आध्यात्मिक कल्पनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक अत्यंत गहरी राजनीतिक और सामाजिक चाल हैं, जिसका एकमात्र उद्देश्य बहुजन समाज को उसके अधिकारों के प्रति अंधा, गूंगा और बहरा बनाए रखना है।

*1 शोषण को 'दैवीय' रूप*
*देने की रणनीति*
मनुवादी या ब्राह्मणवादी चिंतन की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उसने सामाजिक बुराइयों को 'पवित्र' बना दिया। उन्होंने बड़ी चतुराई से गरीबी, लाचारी और जातिगत ऊंच-नीच को 'पिछले जन्म के कर्मों' के साथ नत्थी कर दिया।

जब कोई व्यक्ति अभाव में जीता है, जब उसे दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तो उसे व्यवस्था के खिलाफ लड़ने के बजाय यह समझा दिया गया कि,"यह तुम्हारी अपनी गलती है; तुमने पिछले जन्म में पाप किए थे।

यह सिद्धांत सीधे तौर पर शोषक को सुरक्षा कवच प्रदान करता है। 

यदि पीड़ित व्यक्ति अपने दुख का कारण स्वयं को मानने लगे, तो वह कभी उस व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाएगा,जिसने उसे गरीब बनाए रखा है। यह विचारधारा
 अन्याय को 'नैतिक वैधता' (Moral Legitimacy) प्रदान करती है, जिससे अन्याय करने वाला 'पुण्यशाली' और सहने वाला 'पापी' बन जाता है।

*2 तर्क की कसौटी पर विफलता पहला मनुष्य कौन?*
उत्तर भारत के पेरियार कहे जाने वाले महामना रामस्वरूप वर्मा जी ने इस ढोंगी दर्शन की नींव हिलाने वाला एक सटीक प्रश्न उठाया था, 

यदि हर जन्म पिछले जन्म के कर्मों पर निर्भर है, तो सृष्टि का 'पहला मनुष्य' किसके कर्मों का फल था?"

यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर किसी भी धार्मिक ग्रंथ के पास नहीं है। प्रकृति का नियम स्पष्ट है—बिना बीज के वृक्ष नहीं होता। यदि पहला मनुष्य बिना किसी पूर्वजन्म के पैदा हो सकता है, तो फिर यह 'अनिवार्य नियम' कैसे हो गया कि हर जन्म के पीछे पूर्वजन्म का होना आवश्यक है?

*आज का आधुनिक विज्ञान*
 भी इस कल्पना को पूरी तरह खारिज करता है। विज्ञान कहता है, कि मृत्यु के बाद मानव शरीर पंचतत्वों (पदार्थ) में विलीन हो जाता है। पदार्थ अपना रूप बदलता है, लेकिन उसकी व्यक्तिगत पहचान (Identity) समाप्त हो जाती है।

 जिस प्रकार नदी समुद्र में मिलने के बाद अपना अस्तित्व खो देती है, उसी प्रकार चेतना का कोई भी अंश किसी 'अदृश्य हार्ड-ड्राइव' में स्टोर होकर नए शरीर में नहीं जा सकता।

 *पुनर्जन्म* का कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण आज तक उपलब्ध नहीं है, यह केवल एक मनोवैज्ञानिक भय है।

*3 भाग्यवाद संघर्ष की ऊर्जा का विनाशक*
भाग्यवाद (Fatalism) वह अफीम है, जो मनुष्य की विद्रोह करने की शक्ति को सुला देती है। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा यह मान लेता है कि सब कुछ पहले से तय है, 
तो वह अपनी स्थिति सुधारने की कोशिश ही बंद कर देता है।

*अशिक्षा*
यह कोई भाग्य का खेल नहीं, बल्कि संसाधनों की कमी और शिक्षा के निजीकरण का परिणाम है।

*गरीबी*
यह प्रारब्ध नहीं, बल्कि गलत आर्थिक नीतियों, भूमि के असमान वितरण और श्रम के शोषण का प्रत्यक्ष फल है।

*जाति*
यह कोई ईश्वरीय विधान नहीं है, बल्कि इंसानों द्वारा थोपी गई एक श्रेणीबद्ध असमानता है, जिसे श्रम का विभाजन नहीं बल्कि 'श्रमिकों का विभाजन' कहा जाना चाहिए।

*भाग्यवाद*
मनुष्य को 'स्वयं' की शक्ति से काटकर 'भाग्य' के भरोसे छोड़ देता है, जिससे वह सत्ता और व्यवस्था के सामने आत्मसमर्पण कर देता है।

*4 जड़ पर प्रहार,वर्मा जी का क्रांतिकारी दृष्टिकोण*
महामना रामस्वरूप वर्मा जी का मत अत्यंत स्पष्ट था। वे कहते थे कि वर्ण-व्यवस्था, जातिवाद और छुआछूत के जो जहरीले फल आज हमारा समाज चख रहा है, उसकी मुख्य जड़ 'पुनर्जन्म' और 'भाग्यवाद' की अवधारणा है।

*वे एक सुंदर रूपक के*
 *माध्यम से समझाते थे*
"यदि आप केवल जाति रूपी पत्तों को काटेंगे, तो वे कुछ समय बाद फिर से उग आएंगे। यदि आप केवल शोषण के फूलों को तोड़ेंगे, तो नई कलियाँ पुनः खिल आएंगी। 

*लेकिन यदि आपने तर्क, विज्ञान और मानवतावाद की कुल्हाड़ी से* पुनर्जन्म और भाग्यवाद' की जड़ पर प्रहार कर दिया, तो शोषण का यह विशालकाय वृक्ष स्वतः ही 
धराशायी हो जाएगा।

जब तक समाज यह मानता रहेगा कि उसकी दुर्दशा का कारण 'पिछले जन्म के कर्म' हैं, वह इस जन्म के शोषकों को पहचान नहीं पाएगा।

 इसलिए, प्रतीकों की लड़ाई से अधिक आवश्यक वैचारिक 
जड़ों की लड़ाई है।

*5 वैज्ञानिक दृष्टिकोण एकमात्र विकल्प*
आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, जहाँ विज्ञान और तकनीक का बोलबाला है। विज्ञान सार्वभौमिक होता है, गुरुत्वाकर्षण या बिजली के नियम हिंदू, मुस्लिम, दलित या सवर्ण सबके लिए एक समान काम करते हैं। *इसके विपरीत, पुनर्जन्म और भाग्यवाद के दावे केवल डराने और मानसिक गुलाम बनाए रखने के लिए किए जाते हैं।*

महामना वर्मा जी ने अर्जक संघ के माध्यम से जिस वैज्ञानिक चेतना का आह्वान किया था, वह आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। 

हमें यह समझना होगा कि बीमारियां दवाओं से ठीक होती हैं, पूजा पाठ या झाड़ फूंक से नहीं, और गरीबी मेहनत, सही नीतियों और सामाजिक न्याय से दूर होती है, किसी चमत्कार से नहीं।

*6 निष्कर्ष, वर्तमान ही सत्य है*
मनुष्य का उत्थान किसी अदृश्य 'प्रारब्ध' पर नहीं, बल्कि *बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बताए मार्ग—शिक्षित बनो,संगठित रहो संघर्ष करो पर निर्भर है*

जब तक हम यह मानते रहेंगे कि हमारा दुःख 'पूर्वजन्म' का दंड है, हम संगठित नहीं हो पाएंगे। 

*जिस दिन बहुजन समाज को यह बोध हो जाएगा कि, उसका दुःख इस जन्म की 'गलत सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था' का परिणाम है, उसी दिन वास्तविक क्रांति का सूत्रपात होगा।*

अतः, समय की मांग है कि हम काल्पनिक अतीत और अनिश्चित भविष्य के जाल से बाहर निकलें।

*वर्तमान की जिम्मेदारी अपने हाथों में लें। तर्क को अपना शस्त्र बनाएँ और एक ऐसे समतामूलक समाज के निर्माण में भागीदार बनें जहाँ मनुष्य की पहचान उसके जन्म या भाग्य से नहीं, बल्कि उसके गुण और मानवता से हो,जय समतामूलक समाज!*

*लेखक*
सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य
सामाजिक कार्यकर्ता ब्यावर
94622-60179 sohanlalsingaria@gmail.com

*सन्दर्भ*
 उत्तर भारत के पेरियार कहे जाने वाले महामना रामस्वरूप वर्मा की *पुस्तक पुनर्जन्म और भाग्य*

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*माता रमाबाई: त्याग, तपस्या और मौन बलिदान की प्रतिमूर्ति*जब भी इतिहास डॉ. भीमराव अंबेडकर को 'संविधान निर्माता' और 'शोषितों के मसीहा' के रूप में याद करता है, तब एक मौन लेकिन अत्यंत तेजस्वी अध्याय स्वतः ही उभर कर सामने आता है। वह अध्याय है—*त्याग की प्रतिमूर्ति माता रमाबाई अंबेडकर का जीवन।* माता रमाबाई केवल बाबा साहब की अर्धांगिनी नहीं थीं, बल्कि वे उस महान सामाजिक क्रांति की आधारशिला और प्राणशक्ति थीं।*संघर्ष की मूक आधारशिला*माता रमाबाई का जीवन शब्दों या भाषणों का मोहताज नहीं, बल्कि निरंतर सहे गए कष्टों और अटूट धैर्य की एक जीवंत गाथा है। जिस समय डॉ. अंबेडकर वैश्विक स्तर पर शिक्षा, लेखन और सामाजिक चेतना की मशाल जला रहे थे, उस समय माता रमाबाई घर की जर्जर दीवारों के बीच अभावों से लड़ रही थीं।उनका त्याग कोई साधारण त्याग नहीं था। उन्होंने अपने सुख, स्वास्थ्य और यहाँ तक कि अपनी बुनियादी जरूरतों को भी तिलांजलि दे दी ताकि बाबा साहब का मार्ग निष्कंटक बना रहे। कई बार तो घर में अन्न का दाना तक नहीं होता था, लेकिन उनके स्वाभिमान और समर्पण ने कभी बाबा साहब को इस संघर्ष से पीछे हटने नहीं दिया। वे जानती थीं कि यदि भीमराव रुक गए, तो करोड़ों शोषितों की मुक्ति का स्वप्न हमेशा के लिए अधूरा रह जाएगा।*संतानों का बलिदान: एक हृदयविदारक सत्य*यह विषय केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि उस समय की सामाजिक और आर्थिक विषमता का क्रूर आईना है। माता रमाबाई और बाबा साहब की संतानों ने असमय ही इस दुनिया को विदा कह दिया। वे बच्चे केवल एक परिवार के सदस्य नहीं थे, बल्कि वे उस व्यवस्था की भेंट चढ़ गए जिसके खिलाफ बाबा साहब लड़ रहे थे।गरीबी और उचित चिकित्सा के अभाव में एक माँ अपनी आँखों के सामने अपने जिगर के टुकड़ों को एक एक कर खोती रही, लेकिन उन्होंने अपने दुख को कभी बाबा साहब के मिशन की बाधा नहीं बनने दिया। *यह असाधारण मातृत्व था।* उन्होंने अपने बच्चों को खोया, लेकिन कभी आंदोलन को दोष नहीं दिया, न ही कभी बाबा साहब के संकल्प को कमजोर पड़ने दिया। *उनके बच्चे संघर्ष की उस राह के 'अनदेखे शहीद' थे, जिसकी कीमत समाज के उत्थान के लिए चुकाई गई।**संविधान निर्माण के पीछे की शक्ति*अक्सर कहा जाता है कि डॉ. अंबेडकर ने भारत को संविधान दिया, लेकिन यह भी सत्य है कि उस 'अंबेडकर' को गढ़ने में माता रमाबाई का अतुलनीय योगदान था। यदि माता रमाबाई घर की जिम्मेदारियों का बोझ अपने कंधों पर न उठातीं, यदि वे अभावों को मुस्कुराहट के साथ न सहतीं, तो शायद विश्व को इतना महान विधिवेत्ता और विचारक नहीं मिल पाता।*संविधान* केवल शब्दों और धाराओं से नहीं बना है। यह बना है एक स्त्री के असीम धैर्य से, एक माँ के आंसुओं से और उन बच्चों की मासूम आहों से जिन्होंने संघर्ष की वेदी पर दम तोड़ दिया। *इसलिए, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर वास्तव में माता रमाबाई के ऐतिहासिक त्याग और तपस्या की ही देन हैं।**निष्कर्ष*आज जब हम स्वतंत्र भारत और उसके संवैधानिक अधिकारों की बात करते हैं, तो हमें उन मौन बलिदानों को भी नमन करना चाहिए जो इतिहास के पन्नों में कहीं ओझल रह गए। माता रमाबाई और उनके बच्चों का बलिदान बाबा साहब के आंदोलन की वह ऊर्जा है जिसने करोड़ों दीप प्रज्वलित किए।*नमन है, उस महा माता को, जिसने खुद को मिटाकर समाज को एक नया जीवन दिया।*लेखक:सोहनलाल सिंगारियाप्राचार्य (RES) सामाजिक कार्यकर्ता ब्यावरप्रदेश उप सभा अध्यक्ष राजस्थान शिक्षक संघ अम्बेडकर

*भारत रत्न डॉ. अम्बेडकर,आधुनिक भारत के शिल्पी और सामाजिक न्याय के प्रकाश-पुंज*"अन्याय से लड़ते हुए मर जाना, उस अन्याय को सहते रहने से कहीं बेहतर है।" डॉ. भीमराव आंबेडकर के ये शब्द केवल एक विचार नहीं, बल्कि करोड़ों शोषितों और वंचितों के लिए जीवन का मंत्र हैं। आज जब हम एक प्रगतिशील भारत की बात करते हैं, तो बाबासाहेब का नाम उस नींव के पत्थर के रूप में उभरता है, जिस पर हमारे लोकतंत्र की भव्य इमारत खड़ी है।*1 शिक्षा: सामाजिक परिवर्तन का अमोघ अस्त्र*बाबासाहेब ने शिक्षा को केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और चेतना का आधार माना। उनका वह कालजयी संदेश आज भी गूंजता है: "शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा वह दहाड़ेगा।" उनका स्पष्ट मत था कि अज्ञानता ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। शिक्षा के बिना कोई भी समाज अपनी दासता की बेड़ियों को नहीं पहचान सकता और न ही उन्हें तोड़ने का साहस जुटा सकता है।*2 संविधान निर्माण: राष्ट्र की धड़कन*भारत के संविधान निर्माता के रूप में बाबासाहेब ने एक ऐसे राष्ट्र का स्वप्न देखा जहाँ कानून का शासन हो। उन्होंने कहा था, "संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक जीवन जीने का तरीका है।" उन्होंने एक ऐसा ढांचा तैयार किया जहाँ "स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा" केवल शब्द न रहकर संवैधानिक अधिकार बनें। वे जानते थे कि "कानून और व्यवस्था, सामाजिक स्वास्थ्य का आधार है" और इसी आधार पर एक न्यायपूर्ण समाज खड़ा हो सकता है।*3 महिला अधिकार और हिंदू कोड बिल: एक क्रांतिकारी विजन*डॉ. अम्बेडकर ने समाज की प्रगति का पैमाना महिलाओं की स्थिति को माना। उन्होंने कहा, "मैं किसी समुदाय की प्रगति को उस प्रगति से मापता हूँ जो महिलाओं ने हासिल की है।" स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में उन्होंने 'हिंदू कोड बिल' पेश किया, जो महिलाओं को संपत्ति, तलाक और उत्तराधिकार में समान अधिकार देने का ऐतिहासिक प्रयास था। जब रूढ़िवादी ताकतों ने इसका विरोध किया, तो उन्होंने अपने पद का त्याग कर दिया। यह त्याग उनके इस विचार को पुष्ट करता है कि महिलाओं की प्रगति के बिना समाज की प्रगति असंभव है।*4 जातिवाद का उन्मूलन और सामाजिक संरचना*बाबासाहेब ने जाति को एक मानसिक बीमारी माना। उनके अनुसार, "जाति एक मानसिकता है, जो सामाजिक एकता को नष्ट करती है"। उन्होंने समाज को प्रेरित किया कि "जाति-पाति की दीवारें सामाजिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा हैं"। उनका पूरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक महान व्यक्ति की पहचान उसकी सेवा से होती है, न कि उसकी जाति से।*5 आत्मसम्मान और अनवरत संघर्ष*उन्होंने समाज को कभी लाचार होने की सलाह नहीं दी, बल्कि संघर्ष का आह्वान किया। उन्होंने सिखाया कि "मनुष्य का सबसे बड़ा अधिकार है उसका आत्मसम्मान" और "हमें अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए, क्योंकि कोई दूसरा हमें वह देगा नहीं"। उनका त्रिसूत्रीय मार्ग—"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो"—आज भी हर न्यायप्रिय व्यक्ति का मार्गदर्शक है।*उपसंहार*अंत में, डॉ. अम्बेडकर के शब्दों में कहें तो, "जो समाज अपने इतिहास को भूल जाता है, वह प्रगति नहीं कर सकता"। आज हमारे पास बाबासाहेब के रूप में एक महान इतिहास और उनके विचारों के रूप में एक स्वर्णिम भविष्य है। बाबा साहब को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बताए "मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है" के मार्ग पर चलें और एक समतामूलक समाज के निर्माण में अपना योगदान दें।*जय भीम, नमो बुद्धाय, जय संविधान* *लेखक*सोहन लाल सिंगारिया प्राचार्य (RES) एवं सामाजिक कार्यकर्ता ब्यावर प्रदेश उपसभा अध्यक्ष राजस्थान शिक्षक संघ अम्बेडकर